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दादा लेखराज ( ब्रह्मा बाबा ) का 145 वां जन्मदिवस आज

Today's 145th birthday of Dada Lekhraj (Brahma Baba)

PRAJAPITA BRAHMA
दादा लेखराज

दादा लेखराज  जिन्हें ब्रह्माबाबा  के नाम से भी जानते है,  इन्हें 1949 में यह नाम दिया गया। ब्रह्माबाबा का जन्म  15 दिसम्बर 1876 में हैदराबाद, सिंध ( पाकिस्तान ) में हुआ था, उनके पिता खूबचंद कृपलानी एक ग्रामीण पाठशाला के हेडमास्टर थे।ब्रह्माबाबा की माँ का देहान्त, उनकी अल्पायु में ही हो गया था।1936 में लेखराज ने ओम मंडली नामक आध्यात्मिक संगठन की स्थापना की थी जो आगे जाकर प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के नाम से  विख्यात हुई.

1935 -36 से ही दादा लेखराज,एक हीरों के व्यापारी, को परमात्मा द्वारा विभिन्न प्रकार अनुभूति एवं साक्षात्कार होने लगे थे। उस समय बाबा को यह निश्चय नहीं था कि यह सब कौन कर रहा है। ईश्वरीय प्रेरणानुसार दादा लेखराज एक पाठशाला का आरम्भ कर ,आने वाले बच्चों को गीता का पाठ व आध्यात्मिक संस्करण सुनाने लगे थे। इस पाठ का आरम्भ ही गीता के रचयिता श्री कृष्ण नहीं बल्कि निराकार परमात्मा शिव बाबा हैं ,की व्याख्या से हुआ था। अब तक बाबा को ‘ब्रह्मा ‘ नाम नहीं दिया गया था ,न ही परमात्मा का नाम ‘शिव’ है,यह यज्ञ में किसी को यथार्थ रूप से ज्ञात था। दादा लेखराज ने कुछ समर्पित माताओं व कुमारियों की एक ट्रस्ट की रचना की एवं अपनी समस्त पूंजी उसी यज्ञ/संस्था में दे दी। यह यज्ञ माताओं द्वारा संभाला जाने लगा और एक रूहानी यात्रा का आरम्भ हुआ। जो समर्पित थे ,वे आकर कराची में बस गये और 14 वर्ष स्वपरिवर्तन हेतु तपस्या में बिताये। उनके बारे में कहा जाता है कि उनके पास 12 गुरु  थे, लेकिन उन्होंने अपने स्वयं के सत्संगों का प्रचार या संचालन शुरू किया, जो 1936 तक, उनके समुदाय के लगभग 300 लोगों जुड चुके थे।

BKWSU के दावों के अनुसार, एक रिश्तेदार ने बताया कि एक आध्यात्मिक शक्ति (शिव) ने उसके शरीर में प्रवेश किया और उसके माध्यम से बात की। तब से, लेखराज को  भगवान के एक माध्यम के रूप में माना है, और इस तरह, धार्मिक आंदोलन के विश्वास प्रणाली के भीतर उच्च महत्व के संदेश प्रसारित लेखराज द्वारा प्रसारित करते हैं। इस प्रकार ॐ मण्डली को ब्रह्माकुमारी के रूप में आगे बढाया।

भारत के विभाजन के बाद, ब्रह्म कुमारियों ने अप्रैल 1950 में भारत में माउंट आबू (राजस्थान) चले गए। 18 जनवरी 1969 को लेखराज की मृत्यु हो गई, और ब्रह्म कुमारियों का बाद में अन्य देशों में विस्तार हुआ।

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