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ब्रह्मा बाबा का 51 वां स्मृति दिवस आज, विश्वभर ब्रह्माकुमारी सेवाकेन्द्रों पर विश्वशांति के लिए मेडिटेशन

विश्वभर ब्रह्माकुमारी सेवाकेन्द्रों पर विश्वशांति के लिए मेडिटेशन

ब्रह्मा बाबा का 51 वां पुण्य स्मृति दिवस आज, विश्वभर ब्रह्माकुमारी सेवाकेन्द्रों पर विश्वशांति के लिए मेडिटेशन

दिल्ली :- ब्रह्माकुमारीज संस्थान आज अपने संस्थापक ब्रह्माबाबा की 51वां  पुण्य स्मृति दिवस पर विश्वभर के सभी सेवा केन्द्रों पर योग तपस्या भट्टी का आयोजन किया जा रहा है, विश्व शांति के लिए दिसम्बर महिने से ही तपस्या (मेडिटेशन) की जा रही है | आपको बता दे की भारत भर में अनेक ब्रह्माकुमारी सेवाकेन्द्रों के स्थापना में मार्गदर्शन करते हुए 18 जनवरी 1969 को उन्होंने अपना भौतिक देह त्याग दिया। मधुबन में स्थित शान्ति स्तम्भ उनके जीवन और कार्यों की एक श्रृद्धांजलि के रूप में स्थापित किया गया जो एक सामान्य मनुष्य से अति सामान्य महानता को प्राप्त करना और जीवन के गहन सत्यों को छूने की चुनौती स्वीकार करने का अद्भुत मिसाल साबित हो रहा है। ब्रह्मा बाबा ने 18 जनवरी 1969 को देह त्यागा था, जिसके बाद से ही ब्रह्मा कुमारिज 18 जनवरी को स्मृति दिवस के रूप में  तपस्या करते है |

ब्रह्मा बाबा कौन थे

सन 1880 में एक गांव के विनम्र स्कूल मास्टर के घर में ब्रह्मा बाबा दादा लेखराज कृपलानी का जन्म हुआ। हिन्दू धर्म के रीति रिवाजों के अनुसार लेखराज का पालन-पोषण हुआ। बहुत छोटी उम्र में अनेकानेक काम करने के बाद उन्होंने हीरे-जवाहरातों का व्यवसाय शुरू किया, जिसमें उन्होंने एक हीरा विक्रेता के रूप में बाद में बहुत नाम कमाया। पांच बच्चों के पिता दादा लेखराज अपने समाज का भी नेतृत्व करते थे। जो अपने सामाजिक कार्यों के लिए जाने जाते थे। सन 1936 में उम्र के उस पड़ाव में जब सामान्यत: सभी लोग सेवा निवृत्ति की तैयारी करते हैं तब उन्होंने वास्तव में अपने जीवन के एक सक्रिय और आकर्षक पड़ाव में प्रवेश किया। गहरी आध्यात्मिक समझ और साक्षात्कारों की श्रृंखला के पश्चात् उन्होंने एक सशक्त आकर्षण को महसूस किया और अपने व्यवसाय को समेट कर अपना समय, शक्ति और धन को इस विद्यालय की स्थापना अर्थ खर्च किया जो बाद में ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय बना।

सन 1937 से 1938 के बीच में उन्होंने 8 युवा बहनों की एक व्यवस्थापकीय कमेटी बनाई और अपनी सर्व चल-अचल सम्पत्ति इस ट्रस्ट को समर्पित कर दी।

सन 1936 में ब्रह्मा बाबा को हुए साक्षात्कारों के बाद अनेकों वर्ष बीत गये, जिस जीवनशैली को उन्होंने क्रान्तिकारी रूप से अपने जीवन में अपनाया उससे प्रेरित होकर अनेकों ने अपनेआपको सशक्त बनाकर भविष्य के लिए आशा की किरण जगाई। ब्रह्मा बाबा ने जिस जीवन कौशल की शिक्षा दी वो समय की कसौटी पर खरी उतरती गई। जिन युवा बहनों को उन्होंने सबसे आगे रखा था अब वो अपने 80-90 वर्ष की आयु में शान्ति, प्रेम और ज्ञान का प्रकाश स्तम्भ बनकर आगे बढ़ रही हैं।

ब्रह्मा बाबा के स्मृति दिवस पर कविता

ब्रह्मा बाबा शांति स्तंभ
ब्रह्मा बाबा शांति स्तंभ

 

 

18 जनवरी

संस्कार बड़े ही सुन्दर लेकर वो दुनिया में आया

उसकी रूहानी छवि देखकर मन सबका हर्षाया

बढ़ती उम्र के संग उसकी आभा भी बढ़ती गई

प्रति दिन उसकी रूहानी सुन्दरता निखरती गई

श्रेष्ठ कर्म करते रहकर उसने जीवन किया महान

हर किसी को लगने लगा वो चलन से देव समान

रूहानी सुन्दरता का ये राज उससे पूछा ना गया

उसकी छवि को निहारे बिना हमसे रहा ना गया

जान लिया हमने ये है शुद्ध संकल्पों का कमाल

इसीलिए उसने बनाया हर आत्मा को खुशहाल

उम्र भले झलके चेहरे पर फिर भी वो आकर्षक

हर पल हम उसको निहारते बनकर मूक दर्शक

उसके एक एक कर्म देखकर हुआ हमें एहसास

कैसे किया होगा उसने अपने चरित्र का विकास

बातों ही बातों में कोई आदि देव नहीं बन जाता

करके गहन तपस्या वो खुद को पूरा ही तपाता

योगाग्नि से वो बनकर निकला कुन्दन के समान

इसीलिये तो कहलाया अपना ब्रह्मा बाबा महान

तन से बूढ़ा होकर भी सदा बैठा होकर सावधान

जीवन से मिटाया जिसने माया का नाम निशान

दिल की उदारता से जिसने सब बच्चों को पाला

विकारों में डूबे हुओं को सहज रूप से निकाला

उसकी वृत्ति दृष्टि भावना में था कल्याण समाया

सबके लिए खुद को विश्व कल्याणकारी बनाया

पवित्रता को उसने अपना मूल व्यक्तित्व बनाया

पवित्रता के बल पर ही पहले नम्बर में वो आया

देह में रहकर भी ब्रह्मा बाप रहते थे सदा विदेही

मनसा वाचा और कर्मणा बन गये सर्व के स्नेही

बाप होकर भी जिसने किया बच्चों का सम्मान

नहीं था जिसके भीतर अहंकार का नाम निशान

अलौकिक जन्म देकर माँ का पार्ट भी निभाया

छत्र छाया बनकर उसने सबको दिल में बसाया

बच्चों की हर कमी कमजोरी को उसने समाया

श्रीमत देकर उसने हर मुश्किल को पार कराया

एकान्तप्रिय होकर भी बाबा थे सदा मिलनसार

श्रेष्ठ व्यवहार से किया अपकारी पर भी उपकार

किया जिसने निराकारीपन का पक्का अभ्यास

यादों में बसाया था जिसने शिव को श्वासों श्वास

ईश्वरीय मत को जिसने हृदय से किया स्वीकार

निश्चय बुद्धि बनकर पाया विजय माला का हार

रहता था मुख पे सदा बेफिक्र बादशाही का नूर

सम्पूर्णता की मंजिल पाई करके पुरुषार्थ भरपूर

देहभान त्यागकर जिसने दिव्यता को अपनाया

कर्मातीत अवस्था से खुद को एवर रेडी बनाया

एकाग्र होकर शुभ संकल्पों के प्रकम्पन फैलाये

दिल शिकस्त आत्माओं के चेहरे उसने खिलाये

सहयोग दिया था जिसने सबका सहारा बनकर

अपने बच्चों को जिसने प्यार किया जी भरकर

इसीलिए हर पल हम उनकी आभा को निहारते

वतन में जाकर उनके संग अपना वक्त गुजारते

विश्व परिवर्तन का कर्तव्य वो आज भी निभाता

हम सब बच्चों से मिलने अब भी वतन से आता

कर लें ऐसे ब्रह्मा बाप का दिल से हम अनुसरण

हम भी कर लें बाप समान जिम्मेदारी का वरण

पुरुषार्थ की गति बढ़ाकर कर्मातीत स्थिति पायें

इस वर्ष अपने आपको ब्रह्मा बाप समान बनायें

दादा लेखराज ( ब्रह्मा बाबा ) का 145 वां जन्मदिवस आज

 

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