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अक्यूट इनसेफ्लाइटिस सिंड्रोम से 100 से अधिक बच्चों की मौत

अक्यूट इनसेफ्लाइटिस सिंड्रोम से बच्चों की थम नहीं रही मौत

मुजफ्फरपुर में अक्यूट इनसेफ्लाइटिस सिंड्रोम से बच्चों की मौत का आंकड़ा थम नहीं रहा। अब तक 100 से अधिक बच्चों की मौत की बात मीडिया में कही जा रही है। हालांकि, इस बीमारी के इलाज और रिसर्च के नाम पर 100 करोड़ खर्च हुए। अधिकारियों ने अमेरिका का दौरा भी किया, लेकिन इलाज नहीं ढूंढ़ सके।

हाइलाइट्स

  • 100 करोड़ खर्च, टीका लगाया नहीं, अब बारिश की दुआ मांग रहे जिम्मेदार
  • 7000 से ज्यादा बच्चों को 2002 से 2018 के बीच एक्यूट इनसेफ्लाइटिस सिंड्रोम हुआ
  • बीमारी के इलाज के लिए अमेरिका का दौरा किया, लेकिन समुचित प्रबंध नहीं हो सके
  • गैर-सरकारी आंकड़े के अनुसार इस बीमारी से 2000 से ज्यादा बच्चे पीड़िता हैं

नई दिल्ली 
बिहार के मुजफ्फरपुर में साल दर साल एक ही बीमारी से बच्चे मरते रहे हैं। रोकथाम के नाम पर अमेरिका से जापान तक का दौरा होता रहा, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इस बार भी जब बच्चों की मौतें जारी हैं, तो स्वास्थ्य विभाग इलाज के बजाय ऊपर वाले के रहम पर भरोसा कर रहा है। विभाग चाहता है कि जल्द बारिश हो, जिससे महामारी का प्रकोप थमे। गर्मी बढ़ने के साथ मुजफ्फरपुर में हालात और खराब हो गए हैं। रविवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने वहां जाकर स्थिति का जायजा लिया। 
अगर सरकार ने बनी योजना पर अमल किया होता तो मुजफ्फरपुर में बच्चों की जान बचाई जा सकती थी। वहां अब तक इनसेफ्लाइटिस पर रोकथाम के लिए सरकार ने रिसर्च और और इलाज का उपाय खोजने में 100 करोड़ से ऊपर खर्च किया है। लेकिन फिर भी मौतें जारी हैं। मात्र एक अस्पताल में 100 से ऊपर बच्चे मर गए। रिपोर्ट के अनुसार जिन बच्चों की मौत छोटे अस्पतालों में या घर पर ही हो गईं, उनके आंकड़े शामिल नहीं किए गए। गैर सरकारी आंकड़ा है कि 2 हजार से ज्यादा बच्चे पीड़ित हैं।
गोरखपुर में ठीक, तो मुजफ्फरपुर में क्यों नहीं 
यूपी के गोरखपुर में इस से बचाव के लिए टीकाकरण सफलतापूर्वक हुआ, जिससे बीमारी 60 फीसदी तक काबू में आ गई। सवाल यह उठ रहा है कि जब गोरखपुर में टीकाकरण हुआ, तो ऐसा मुजफ्फरपुर में क्यों नहीं हो सका। इनसेफ्लाइटिस के सबसे ज्यादा शिकार गोरखपुर और मुजफ्फरपुर रहे हैं। 

अस्पताल नहीं थे तैयार, बेड कम पड़े 
एहतियात बरतने के मामले में लापरवाही सामने आई है। मसलन महामारी हर साल आती है, फिर भी मेडिकल कॉलेज से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में अलग से तैयारी नहीं की गई। मेडिकल कॉलेज में मरीजों के बेड तक कम पड़ गए। स्वास्थ्य विभाग अब बारिश के लिए दुआ कर रहा है। 


अमेरिका गए, पर इलाज का तरीका नहीं खोजा 
लापरवाही की सबसे बड़ी मिसाल यह भी है कि जानलेवा बीमारी के लिए इलाज का क्रम या तरीका (प्रोटोकॉल) तक तय नहीं हो पाया है। 2015 में स्वास्थ्य मंत्रालय के एक्सपर्ट की टीम इस बारे में रिसर्च और इलाज का तरीका तय करने अमेरिका के अटलांटा गई। लेकिन हुआ कुछ नहीं। 
वर्षों से आ रही बीमारी की योजना फाइलों में बंद रही। हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई इस दौरान। 
मौत के मुंह के करीब भाई, बिलखकर बोला,‘मुझे भी मार दो...’ 
मुजफ्फरपुर में अस्पतालों से हर पल बच्चों के शव के पास रोती-बिलखती मांओं के दिल झकझोर कर रख देने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं। श्रीकृष्णा मेडिकल कॉलेज व अस्पताल में भर्ती आखिरी सांस ले रहे मरीज के भाई ने मीडिया और नेताओं को देखकर आपा खो दिया। मरीज के भाई ने कहा, 'मेरा बड़ा भाई दो महीने से अस्पताल में भर्ती है। मैं चाहता हूं कि उनको और सभी बच्चे जो मरने की स्थिति में हैं उन पर ध्यान दिया जाए, उन्हें सही इलाज दिया जाए। मैंने ब्लड दिया, छोटे भतीजे ने ब्लड दिया लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। मीडिया वाले आते हैं, नेता आते हैं और चले जाते हैं, कोई सुनने वाला नहीं हैं। बताइए क्या करें, या तो हमें भी जान से मार दीजिए।' 

भयावह हैं आंकड़े 

7000 से ज्यादा बच्चों को 2002 से 2018 के बीच एक्यूट इनसेफ्लाइटिस सिंड्रोम हुआ 
2 हजार से ज्यादा बच्चों की मौत इस बीमारी के कारण अब तक हो चुकी है