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पीएम नरेंद्र मोदी मूवी रिव्यू


पीएम नरेंद्र मोदी मूवी रिव्यू / सच दिखाने से ज्यादा मोदी को संत के रूप में पेश करती है फिल्म

स्टार रेटिंग2.5/5
स्टारकास्टविवेक ओबेरॉय, जरीना वहाब, मनोज जोशी, बरखा सेनगुप्ता, किशोरी शहाणे
निर्देशकओमंग कुमार
निर्मातासुरेश ओबेरॉय, संदीप सिंह, अर्चना मनीष और आनंद पंडित
जॉनरबायोग्राफिकल ड्रामा
अवधि 136 मिनट
बॉलीवुड डेस्क. पीएम नरेंद्र मोदी को भले ही बायोपिक कहा गया है, लेकिन इसे देखने के बाद ऐसा महसूस होता है कि डायरेक्टर ओमंग कुमार ने यह फिल्म बस दो घंटे तक मोदी की तारीफ के लिए बनाई है। इस फिल्म में मोदी जी को एक ऐसी शख्सियत बताया गया है, जो कि नेकी में भगवान से कम नहीं है। एक बायोपिक तभी दिलचस्प हो सकती है, जब आप एक इंसान के जीवन को ईमानदारी से दिखाएं। आप भले ही उनकी अच्छाई पर ज्यादा ध्यान दें, लेकिन थोड़ी-बहुत बुराई भी दिखाएं। ताकि दर्शक आपकी कहानी पर विश्वास कर सकें। लेकिन ओमंग कुमार ने ऐसा नहीं किया और नतीजा यह रहा कि उनकी फिल्म ज्यादातर बोर करती है। हैरत की बात है कि डायरेक्टर अपनी बात मनवाने के लिए अपने देश के इतिहास को भी तोड़ मरोड़ के पेश करते हैं। 

4 पॉइंट्स में जानिए कैसी है फिल्म

  1. सच दिखाने से ज्यादा मोदी को संत बताने पर फोकस

    मोदीजी की जिंदगी की विवादित घटनाओं जैसे उनकी शादी, गुजरात में हुए दंगे आदि को बिल्कुल ही बदलकर दिखाया गया है। कहानी सच को पेश करने से ज्यादा यह दिखाने की कोशिश करती है कि मोदीजी संत  हैं और वो बस जिंदगीभर दूसरों की निस्वार्थ सेवा में जुटे रहे। फिल्म देखने के बाद समझ आता है कि चुनाव आयोग ने इसे इलेक्शन के वक्त रिलीज होने से क्यों रोका था। फिल्म के स्क्रीनप्ले में इतना इमेजिनेशन है कि एक सीन में तो खुद मोदीजी आर्मी के साथ कश्मीर में आतंकवादियों से लड़े और बर्फीले पहाड़ों की चोटी पर भारत का झंडा फहरा दिया। 
  2. मोदी के रोल में फिट बैठे विवेक ओबेरॉय

    भले ही इस फिल्म की नीयत सही नहीं है, लेकिन विवेक ओबेरॉय ने बड़ी ही निष्ठा से इस पात्र को निभाया है। वो सिर्फ मोदीजी की तरह दिखे हैं, बल्कि उन्होंने उनके हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज की भी बखूबी नकल की है। जरीना वहाब ने मोदी की मां के किरदार में बेहतरीन काम किया है। 
  3. ओमंग कुमार ने चुनी अंध भक्ति की राह

    ओमंग कुमार ने एक अच्छा मौका खो दिया, जिसमें वो मोदीजी के करिश्माई व्यक्तित्व पर ध्यान केंद्रित कर सकते थे। गरीब परिवार में पल-बढ़कर प्रधानमंत्री बनने तक की मोदीजी की प्रेरणादायक कहानी को अगर ईमानदारी से कहा जाता तो फिल्म काफी दिलचस्प होती। लेकिन उन्होंने अंध भक्ति की राह चुनी। 
  4. मोदी को संत मानने वालों के लिए है फिल्म

    फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जो आपको मोदीजी के जीवन की सच्ची झांकी दिखाए। अगर आप उन्हें करिश्माई नेता से ज्यादा ऐसा संत समझते हैं, जिसमें कोई ऐब नहीं तो आप यह फिल्म देख सकते हैं। 

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